Tata Steel : ट्रेड यूनियन हो या क्रिकेट का खेल…टीम में बिखराव हो तो इशारा मिलता ही है

टाटा स्टील के अफसरों के साथ क्रिकेट का मैच हुआ तो मैदान में नजर नहीं आए यूनियन के कई धुरंधर

दोस्ताना मैच के लिए स्टेडियम में सतीश, डॉ आलम एवं नितेश का नहीं आना संयोग या प्रयोग

साल भर से संजीव और सतीश के बीच टकराव का संकेत, ऑफिस बेयरर्स के भी विभक्त होने का संदेश

अश्विनी रघुवंशी

इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपता। टीम में बिखराव हो तो इसके इशारे मिल ही जाते हैं। ट्रेड यूनियन हो अथवा क्रिकेट का मैदान, अगर टीम बिखर रही हो तो खिलाड़ियों के साथ दर्शकों के दिमाग थोड़ा बहुत जरूर झनझना जाता है। टाटा स्टील के कॉरपोरेट सर्विसेज उपाध्यक्ष डी बी सुंदर रमण, ह्यूमन रिसोर्सेज चीफ जुबीन पलिया, आईआर चीफ राहुल दुबे, राजेश चिंतक, प्रणय सिन्हा, मुकेश अग्रवाल जैसे कॉरपोरेट दिग्गजों की मौजूदगी में टाटा स्टील प्रबंधन और टाटा वर्कर्स यूनियन के बीच शनिवार को क्रिकेट मैच हुआ। कीनन स्टेडियम में मौजूद यूनियन अध्यक्ष संजीव चौधरी उर्फ टुन्नू चौधरी ने बुलाया। इसके बावजूद यूनियन महामंत्री सतीश सिंह, उपाध्यक्ष डॉ शहनवाज आलम और सहायक सचिव नितेश राज न क्रिकेट मैच खेलने आए और न ही देखने की जहमत उठाई। जाहिर है, टाटा स्टील के अधिकारियों के दिमाग में यह मसला अनायास खटका होगा। स्टेडियम आए टीएमएच के क्रिटिकल केयर यूनियन (सीसीयू) हेड डॉक्टर आसिफ़ अहमद को भी ट्रेड यूनियन के भीतर कुछ बड़ी बीमारी होने के लक्षण समझ में आए होंगे।

दोस्ताना मैच में टाटा वर्कर्स यूनियन के कोषाध्यक्ष अमोद दुबे और सहायक सचिव श्याम बाबू ने वो उत्साह नहीं दिखाया। कंपनी के वरीय अधिकारियों का आगमन हुआ था। चेहरा देखे और दिखाए। शुरुआती कुछेक ओवरों तक रुकने के बाद मैदान छोड़ दिए। यूनियन की सियासत को नजदीक से झांकने वालों की नजर इस प्रसंग पर भी है। दत्तदल, टाटा वर्कर्स यूनियन के ऑफिस बेयरर्स और कमेटी मेंबरों को साल भर पहले से संजीव चौधरी और सतीश सिंह के बीच टकराव के संकेत दिख रहे हैं। यहां तक कि पिछले छह महीने से ऑफिस बेयरर्स के भी अलग अलग खेमा में विभक्त होने का हल्का संदेश मिलने लगा है। क्रिकेट मैच ने यूनियन के भीतर बिखराव की ओर बढ़ा इशारा किया है।

टाटा स्टील की जमशेदपुर इकाई में वेज रिवीजन का समझौता होने में तेरह माह का विलंब हो चुका है। अभी और न जाने कितना वक्त लगेगा, कोई सटीक तौर पर कह नहीं सकता। नए साल की शुरुआत से पहले टाटा वर्कर्स यूनियन के संविधान में संशोधन किया गया जिसमें कई ऐसे निर्णय हुए जो विशेष कर कमेटी मेंबरों को अप्रिय लगे हैं। तकरीबन एक माह पहले टाटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष संजीव चौधरी की पहल पर टाटा स्टील प्रबंधन और टाटा वर्कर्स यूनियन के बीच दोस्ताना क्रिकेट मैच खेलना तय हुआ तो टाटा वर्कर्स यूनियन के भीतर खूब कानाफूसी हुई। यह बात सामने आई कि संजीव चौधरी ने सब कुछ खुद तय किया। इसकी सूचना यूनियन महामंत्री सतीश सिंह को मिली, तभी उन्होंने इशारा किया कि दोस्ताना मैच के लिए यह उचित वक्त नहीं है। सतीश सिंह ने यूनियन के करीबी ऑफिस बेयरर्स और कमेटी मेंबरों से भी इस पर चर्चा की थी। उनकी कोर मंडली का मत था कि वेज रिवीजन का बढ़िया समझौता हो जाता तो दोस्ताना मैच में और मजा आता।

सियासत में आपसी टकराव सुनाए नहीं बल्कि दिखाए भी जाते हैं

टाटा स्टील प्रबंधन और यूनियन के बीच दोस्ताना मैच के आयोजन में शिरकत नहीं करने पर सतीश सिंह, डॉ शहनवाज आलम और नितेश राज से पूछिए तो एक सामान जवाब मिलता है, किसी जरूरी कार्य से व्यस्त थे। सतीश सिंह के परिवार में कोई आयोजन होने की बात कही गई तो डॉ शाहनवाज आलम अरका जैन यूनिवर्सिटी में व्याख्यान देने गए थे। नितेश राज भी इसी तरह कही न कही व्यस्त हो गए थे। आधिकारिक तौर पर कहा भी यही गया। यूनियन कोषाध्यक्ष अमोद दुबे और सहायक सचिव श्याम बाबू स्टेडियम आए तो सिर्फ उपस्थिति दर्ज करा कर निकल गए। पूरे प्रकरण से संदेश यही गया कि संजीव चौधरी की कप्तानी में अब भरोसा टूट रहा है। वैसे भी सियासत में सब कुछ मुंह से कहा नहीं जाता, कुछ दिखा कर भी कहा जाता है। वेज रिवीजन का समझौता होने और उसके बाद यूनियन चुनाव तक ऐसी और भी सियासी कहानी सुनाई और दिखाई दे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। किसी शायर ने खूब कहा है _

सियासत इस कदर अवाम पे अहसान करती है… आँखें छीन लेती है फिर चश्में दान करती है….

(🖊️ लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं )

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