गीता बालमुचू…हार नहीं मानूंगी रार नयी ठानूंगी

ऐसे राजनीतिक रण में बनाया गया सेनापति जहां खोने को कुछ भी नहीं

जिस कोल्हान में कभी हर तरह लहराता था भगवा, वहां अब सिर्फ तीर धनुष

गीता का जीवन ऐसा कि बेहद प्रतिकूल हालात से भी सफल वापसी का माद्दा

अश्विनी रघुवंशी

2004 में झारखंड विधानसभा के चुनाव होने वाले थे। झारखंड बनने के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव था। दैनिक जागरण के चाईबासा संस्करण में पहले पन्ने पर न्यूज स्टोरी प्रकाशित हुई कि गीता बालमुचू भी चाईबासा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार हैं। बागून बाबू कांग्रेस से टिकट के दावेदार थे। उन्होंने गीता बालमुचू को कॉल किया। मजाकिया लहजे में बोले कि झींकपानी के मायके के नाते रिश्ते में साली लगती हो। यदि मुझसे शादी कर लो तो चुनाव में समर्थन कर दूंगा। पहले तो गीता नाराज हुई। कुछ देर बाद बागून बाबू मजाकिया दौर से बाहर आए। बोले कि गीता की खासियत है जुझारूपन। उसमें किसी भी कठिन परिस्थिति से वापसी का माद्दा है। मेरी तरह वो भी कोल्हान की लंबे समय तक सेवा करेगी।

न बड़ी पारिवारिक पृष्ठभूमि, न बड़ी आर्थिक हैसियत। गीता की यात्रा शुरू हुई तो चाईबासा नगर परिषद की चेयरमैन बनी। भाजपा में प्रदेश स्तर तक पदाधिकारी का दायित्व मिला। चाईबासा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा ने देर से ही सही, टिकट दिया। अब उन्हें चाईबासा का जिलाध्यक्ष बनाया गया है। हालांकि, जिलाध्यक्ष के लिए रायशुमारी हुई तो उनके नाम का तामझाम नहीं था। मगर आखिरकार उन पर ही भरोसा जताया गया। उन्हें चाईबासा और जगन्नाथपुर अनुमंडल में भाजपा के संगठन को सबल, सक्रिय और सुचारू बनाए रखने की जवाबदेही मिली है। उनके कार्य क्षेत्र में तीन विधानसभा क्षेत्र आते है, चाईबासा, जगन्नाथपुर और मझगांव। तीनों सीट अभी यूपीए गठबंधन के पास है। चाईबासा से चार बार चुने जा चुके दीपक बिरुआ कैबिनेट मंत्री हैं। 2024 के पिछले चुनाव में उन्होंने गीता बालमुचू को ही बड़े अंतर से हराया है। निरल पूरती लगातार मझगांव को फतह कर रहे हैं। वे पूर्व मंत्री बड़कुंवर गगराई को लगातार मात दे रहे हैं। पिछले चुनाव में तो बड़कुंवर को कुल जितने मत मिले, उससे ज्यादा मतों के अंतर से हार नसीब हुई है। पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा का किला जगन्नाथपुर भी अब अभेद नहीं रहा है। वहां भी कांग्रेस के सोनाराम सिंकू ने पांव जमा लिए हैं। उन्होंने पिछली बार करीबी संघर्ष में गीता कोड़ा को पराजित किया है। चुनावी राजनीति की बात करे तो पूरे कोल्हान क्षेत्र में भाजपा रसातल में जा चुकी है। आशय यह है कि अब वहां भाजपा के पास खोने को कुछ नहीं है। पाने को सारा जहां।

आदिवासियों को भाजपा से दोबारा जोड़ना ही सबसे कठिन परीक्षा

पश्चिम सिंहभूम में सर्वाधिक आबादी आदिवासियों की है। 75 प्रतिशत से भी ज्यादा। उनमें भी सबसे ज्यादा हो आदिवासी है। कभी हो आदिवासियों का एकतरफा झुकाव भाजपा की ओर होता था। यही वजह है कि लंबे समय तक पश्चिम सिंहभूम की अधिकतर सीटों पर कमल खिलता रहा है। पिछले एक दशक में आदिवासी धीरे धीरे भाजपा से दूर होते गए हैं। भाजपा के संगठन का भी गांवों से रिश्ता लगभग टूट सा गया है। चाईबासा में जाइए तो बुजुर्ग हो चुके संगठन के पुराने लोग मजाक करते है, अभी भाजपाइयों के तीन ही काम…भजन, भोजन और विश्राम। संगठन को विश्राम की मुद्रा से बाहर निकलना गीता बालमुचू के लिए बड़ा काम होगा।

जहां भी जाइए, अलहदा पहचान पाइए…संगठनकर्ता साबित करना आसान नहीं

गीता बालमुचू। उनकी अलहदा पहचान रही है। पूर्वी सिंहभूम में पटमदा के गोबरघूसी की ओर जाइए तो उन्हें बेहद मेहनती एनजीओ कार्यकर्ता की पहचान के नाते पाइएगा। झींकपानी में ऐसी झारखंडी महिलाएं मिलेंगी जिनके लिए वो ऐसी दीदी हैं जिन्होंने सिलाई कढ़ाई का प्रशिक्षण दिलाकर आर्थिक तौर पर स्वावलंबी बनने का मार्ग प्रशस्त किया। एक ऐसी मां हैं जिन्होंने सालों तक अकेले अपने इकलौते बेटे कृष्णा का लालन पालन किया। यशोदा की तरह। ससुराल को संभाली तो पेट्रोल पंप के व्यवसाय में लगातार अवॉर्ड पाया। चाईबासा नगर परिषद की अध्यक्ष रही तो कॉरपोरेट से सीएसआर में खूब काम कराया। मगर अब संगठनकर्ता के नाते खुद को सिद्ध करना आसान नहीं है। हां, सहज और सरल स्वभाव के नाते कार्यकर्ताओं से रिश्ता जोड़ना उनके लिए जरूर आसान होगा। मेहनती भी हैं। मगर, उनकी राह भी आगे बहुत अगर मगर है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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